Thursday, December 7, 2017

नन्हा अभिभावक


रोजगार की तलाश में घूमते घुमक्कड़ लोगों के अस्थाई से डेरे इस बार भी विद्यालय की सीमा के आसपास दिखाई दिए, तो कुछ सहकर्मियों ने उन डेरों के बच्चों को स्कूल से जोड़ने का उपक्रम किया | उन बच्चों के रहन सहन तौर-तरीकों को लेकर कुछ लोग असहज भी थे लेकिन धीरे-धीरे नियमित आने वाले बच्चों के स्वभाव और तौर-तरीकों में परिवर्तन लाने में शिक्षकवृंद सफल भी हुआ |
इन्हीं बच्चों में से एक बच्चा जो अपनी सात वर्षीय उम्र से कुछ ज्यादा ही समझदार दिखाई देता है अक्सर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने मेरे पास आ ही जाता है | मात्र दो माह में पढ़ाई में भी उसका अच्छा प्रदर्शन देखने को मिला है |
प्रारंभ के एक माह सभी बच्चों को एक साथ बैठाकर केवल बातचीत,व्यवहार व सफाई की आदतों को सिखाया जा रहा था | फिर सीखने के लेवल और आयु के आधार पर अलग-अलग बैठाने लगे तो वह बच्चा अपनी नन्हीं बहन को , जो दूसरे कक्ष में बैठती थी हर कालांश में उसे सँभालने जाता | शाम को घर जाते वक़्त अपनी बहन सहित दूसरे छोटे बच्चों को भी डांट-डपट कर सड़क के किनारे चलने को कहता | कभी आने में देर हो जाए तो कारण बताने भी जरूर आता ये सब बातें उसकी जिम्मेदारी भरी समझ को बताती है | 
अक्सर अपनी प्रगति की जानकारी देने वो आ ही जाता है | इसी क्रम में दो दिन पहले वो एक सवाल लेकर मेरे पास आया मेरा ध्यान उसके सवाल पर नहीं था और मैं उसके सवाल तक पहुँचूँ इससे पहले उसने बड़ी मासूमियत से पूछा “आपको नहीं आता ?” मैंने ना में गर्दन हिला दी | कुछ दयापूर्ण दृष्टि से देखते हुए उसने अपने सहज अभिभावकीय अंदाज में कहा “कोई बात नहीं मैं सर से पूछ लूँगा |”
सरलता से कहा गया उसका यह वाक्य कितनी तरलता से भरा था मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती | एक तरफ खिल्ली उड़ाने का बहाना ढूंढते तथाकथित बुद्धिजीवी और एक तरफ बालमन की यह सहज स्वीकार्यता , कि आप जैसे हैं वैसे अच्छे हैं आप कुछ जानते हैं, तो ठीक , नहीं जानते तो भी ठीक ....|   उसका अभिभावकीय संरक्षण जो अपनी छोटी बहन के प्रति है बिलकुल वही अपनी अध्यापिका की तरफ भी |
वो तरलता वो सरलता जो सहज स्वभाव के रूप में उसकी पूँजी है क्या किसी विश्वविद्यालय की डिग्री किसी को दिला सकती है ? वो सुन्दर भाव जो अभावों में उसे उपलब्ध है वो भौतिक साधनों की उपलब्धता में कहीं दब जाते  हैं | अभावों के जीवन से उपार्जित यह विलक्षण भाव  चिरंजीवी हो यही प्रार्थना है !!!

    

Tuesday, November 21, 2017

तरक्की

                                 


लगता था रफ़्तार है तो तरक्की है | लेकिन सड़कों के गड्ढ़े लगातार बढ़ रहे थे | नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत याद करते  हम इंतज़ार कर रहे  थे , कि कब आयेंगे अच्छे रफ़्तार भरे दिन | 
अचानक कुछ हलचल दिखाई दी कोलतार, रोड़रोलर और मजदूर .... लगा कि दिन पलटने को हैं लेकिन जैसे-जैसे सड़क उभरने लगी वैसे-वैसे ही उभरने लगे कुछ स्पीड ब्रेकर ...... लोगों ने खुद बनवाये थे .....ज्यादा नहीं हर दूसरे –तीसरे घर के बाद एक ...... 

Tuesday, October 10, 2017

पटाखों पर बैन

पटाखों पर बैन को लेकर बहुत से लोग इसे हिंदुत्व के विरोध में बता रहे हैं | इन दिनों लोगों की कुछ मुद्दों पर प्रतिक्रियाएं पढ़कर बार बार यह प्रश्न मेरे मन में उठ रहा है कि हिंदुत्व आखिर है क्या ? मेरी अल्पबुद्धि तो अपने हिंदुत्व को इतना ही समझ पाई है कि यदि मैं राम के आदर्शों पर कुछ दूर भी चल सकूँ तो हिंदुत्व के गौरव की रक्षा में मेरा योगदान रामसेतु निर्माण में गिलहरी के मुट्ठी भर रेत के योगदान जैसा तो हो ही जाएगा |
भाई के लिए सम्पूर्ण राज्य का त्याग करने वाले राम शायद आज उन भाइयों से पूछना चाहते होंगे कि क्यों तुम छोटी छोटी बातों को लेकर नित्य न्यायालयों में जूझने चल देते हो ? आओ मुझे मानते हो तो कुछ त्याग करके दिखाओ |
आज राम पूछना चाहते होंगे कि-
जरा बताओ तो क्या तुम छुआछूत छोड़ चुके हो मैनें तो माँ शबरी के जूठे खाते वक़्त एक बार भी नहीं पूछा कि तुम्हारी जाति क्या है , क्या तुम सहज ऐसा कर पाओगे ?
माँ कैकेयी के आदेश को जिस तरह मैनें शिरोधार्य किया क्या तुम अपनी माँ के आदेश का मान बिना कोई प्रश्न किये रख पाते हो ?
जिस तरह मैनें सुग्रीव नल नील हनुमान और अंगद को नेतृत्व का मौका दिया क्या तुम अपने सहयोगियों अपने छोटे भाई बहनों को आगे बढ़ने का मौका देते हो ?
क्या अपने भाई को इतना प्रेम देते हो कि वो तुम्हारी अनुपस्थिति में भी तुम्हारे हिस्से की रक्षा मेरे अनुज भरत की तरह कर सके ?
क्या तुम में इतनी उदारता है कि अपने विरोधी के दुष्प्रयासों को निष्फल करने के बाद भी उसके ज्ञान का आदर कर सको ?
क्या इतना साहस जुटा पाओगे कि देश के हितार्थ सेवार्थ दो जोड़ी कपड़ों में चल पड़ोगे ?
अगर वाकई इतना साहस है तो अपने बीमार भाई बहनों के स्वास्थ्य हित चिंतन से तुम्हारा हिंदुत्व किसी दृष्टि से कमजोर नहीं होगा |
प्रदूषण संबंधी बयानों में गाड़ियों के प्रदूषण संबंधी बात की जा रही है हाँ एक उपाय ऑड-इवन नंबर वाला कुछ हद तक कारगर हुआ था तो क्यों न  बिना किसी विरोध के हम उसे अपना लें |
हाँ बिलकुल मैं इस बात से सहमत हूँ कि नववर्ष , शादी ब्याह जैसे मौकों पर भी पटाखे और कानफोडू डीजे से दूर रहना जरुरी है |
प्रदूषण कारखानों से भी फैलता है अगर अनावश्यक खरीदारी को संयमित कर सकें तो इस पर भी अंकुश लग सकेगा |इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मांग की गयी थी कि पटाखों के लिए दिवाली और चार दिन की  ही इजाजत हो साथ ही पटाखे चलाने के लिए कोई स्थान निर्धारित हो और शाम 7 बजे से नौ बजे तक का समय हो |सुप्रीम कोर्ट ने इस सम्बन्ध में पुरानी गाइड लाइन को ही मानने के आदेश जारी किये हैं जिसमें वर्ष २००५ में सुप्रीम कोर्ट ने रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच रोक लगाईं थी |ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका तो दुष्यंत जी सोच की तरह बिलकुल स्पष्ट है कि
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सारी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए”
  

जिस दिन अपने भाईयों और बहनों के प्रति हमारी सोच इतनी उदारता पूर्ण होगी कि हम यह समझ लें कि श्री  राम का प्रत्येक संकेत ,चेष्टा और प्रसन्नता भारत के राज्याभिषेक के लिए थीं और भरत की सारे प्रयास श्री राम के राज्याभिषेक के लिए थीं और हमें इनका अनुकरण करना है तो हिंदुत्व और हमारी संस्कृति को कोई हानि  नहीं पहुंचा सकेगा |



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